Thursday, May 21, 2009

परग्लिडिंग

मेरा नया विडियो

ये paragliding का विडियो है मनाली का

Friday, May 15, 2009

मेरी खीची हुयी कुछ अछी तस्वीरें ......

नाना नानी जी जिन्हें हम सम्मान से अम्मा बाबूजी कहते हैं , बाबु जी अब नही हैं हमारे बीच यहाँ एक विशेष तस्वीर है
कमल के फूल राधा क्रिशन मन्दिर में

















Thursday, May 14, 2009

क्या खूब लिखा है किसी ने

जीवन की विषमताओ ने खींचीहांथों में जो आडी-तिरछी रेखाएँ हैं,
उनमे, आओ, कुछ उमंग के रंग भरें,
आओ, एक कविता का सृजन करें।
सूनी-सूनी आँखों में छुपकर बैठा हैं,एक उदास बड़ा, बूढा धूमल अंधड़,
उसकी तृप्ति को, आओ, सावन की एक बूँद बने,
आओ, एक कविता का सृजन करें
पत्थरीले प्रगतिपथ पर पड़ा यहाँ तिमिर सघनहताशा का दामन थामे थककर खड़े
वहां कदम कईउनके हारे बिखरे पग में, आओ, अन्तिम दीपशिखा से जलें
आओ, एक कविता का सृजन करें
आशाओं से च्युत हो गिरते हो जहाँ मन विकल,लक्ष्य विहीन होकर मार्ग निरखते हों
नयन विह्वलउनके आहात तन को सहलाने को, आओ, मृदुल स्पर्श बने
आओ, एक कविता का सृजन करें

Wednesday, May 13, 2009

नित नए रंग में आता हूँ

नित नए रंग में आता हूँ , नित नए रूप दीखाता हूँ
अरे .. तुम सपनो तो बुनो मैं उन्हें साकार बनाता हूँ

तुम शोक में रहते हो क्यों पीडा सहते हो क्यों
बस एक बार मुस्कराकर तो देखो
मैं हँसी बन जाता हूँ नित नए रूप में आता हूँ

इन फूलों को देखो, जब पतझड़ इनका तन सुखा जाता है
तब इनके कोरे फलकों पर , मै ही तो जल बरसाता हूँ
मै रंगखिलाता हूँ ओउर देखों इनका रूप कैसा निखर जाता है

नित नए रंग में आता हूँ , नित नए रूप दीखाता हूँ
अरे .. तुम सपनो तो बुनो ,उन्हें मैं साकार बनाता हूँ

क्या लिखूं


कभी अकेलें में सोचता हूँ की कितनी दूर निकल आया हूँ
कितने लोग ओउर कितनी यादें पीछें छूठ गई ।
वो लोग जिन्होंहेने जाने अनजाने मुझ पर वोश्वास या अविश्वास किया , या वो जो शायेद मुझे इस लायक भी न समजे खैंर.......

naya savera




कितना मधुरिम चंचल प्रभात
मंद मंद घूंघट उतार, केशों का नैसर्गिक श्रृंगार
उषा विहंसी कर नयन खोल, हो गए रक्तवर्णी कपोल
बाला का कोमल सरस गात
कितना मधुरिम चंचल प्रभात।

दे रहा दूत सबको संदेश, हो रहा दिवाकर का प्रवेश
अरि करते गुंजित ह्रदय तार, करने को स्वागत है तैयार
हो क्षीण भगी फ़िर कुटिल रात
कितना मधुरिम चंचल प्रभात।

कर रहे नृत्य सारे प्रसून, छाई मधुपों की लय गुनगुन
पक्षीगण गाते मधुर गान, करवाते सबको सुधा पान
ये मलय पवन का मृदुल हाथ
कितना मधुरिम चंचल प्रभात।

किरणों ने कोमल पत्रों के, आलिंगन कर आंसू पोंछे
भर दिए पुष्प में नवल रंग, पुलकित धरणी का अंग अंग
सब वृक्ष झूमते साथ साथ
कितना मधुरिम चंचल प्रभात।

कलुषित रजनी तम से भर तन, बोझिल करुणा से उसका मन
बस फूट पड़ी कलकल छलछल, यौवन और ऊपर से उच्श्रंखल
बह चली निर्झरी सद्यस्नात
कितना मधुरिम चंचल प्रभात।